एक कहानी..जिसे जब जो पढता है खो जाता है अजब दुनिया में..जहाँ से वापस आ पाना है नामुमकिन...क्या ध्रुव और नागराज अपनी शक्ति और दिमाग के उपयोग से इस कहानी से पार आ पाएंगे...देखते हैं..इस कहानी में..

द स्टोरी :

आज कल काम बहुत बढ़ गया है..ओह्ह काम नहीं कॉम्पिटिशन बढ़ गया कहना ज्यादा सही रहेगा. आस पास क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? कोई नहीं देख रहा ..देख रहे हैं तो बस आगे निकलना. पर जब इस दौड में गिरते हैं और उठते हैं तब अक्ल ठिकाने आ जाती है.

भारती न्यूज़ चैनल में भी रोज की तरह एक नोर्मल दिन...सब कर्मचारी अपने कामों में लगे हुए. भारती: राज, देखो न! दोपहर हो गयी है कोई बढ़िया खबर नहीं आई,और तुम ये क्या कर रहे हो? राज: अब मैं क्या कर सकता हू? अब फ्री हूँ तो ये आर्टिकल पूरा कर रहा हू..भूत और इंसान. भारती:हम्म..अच्छा तो तुम भूतों के बारें में क्या सोचते हो? क्या भूत होते हैं? बताओ. राज: भारती देखो..भूत होते हैं...क्यूंकि इंसान और स्वर्ग के बिच में भी एक दुनिया है और होनी भी चाहिए , लेकिन भूत कोई शक्तिशाली ताकत नहीं है..वो जीना चाहता है तुम्हारे शरीर को अपनाकर..वो कभी तुम्हे शरीर पर हमला नहीं करेगा..तुम्हारे दिमाग पर करेगा..तुम्हारी आत्मा पर कब्ज़ा करेगा...और फिर...

“माफ कीजिये मैडम, क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?”दरवाज़े पर अनुरोध खडा था.वो घबराया सा था. भारती ने उसे अंदर बुलाया ”बोलो, कोई खबर है क्या?”

“येस मेम! एक बड़ी अजीब बात पता चली है...महानगर में..अजीब तरह से लोगों की मौत हो रही है. ये देखिये सारी कहानी..३ दिन मे ८ लोगों की मौत.”

“उनके मरने में अजीब क्या है?”राज ने पूछा.

“देखिये सर इस लिस्ट में...जो ८ लोग मरे हैं वो एक ही तरह मरे हैं..डॉ. के हिसाब से ये सब कोमा में गए और मर गए..लाजवाब बात ये है की कोई भी बीमार नहीं था.इनमे ३ केस तो हिलाने वाले हैं..क्यूंकि जब इन ३ के घर वालों को पता लगा की..ये मर गए और इनका आत्म-संस्कार करने गए और जलाया तो ये जिन्दा हो गए लेकिन जलने के कारन मर गए. ये देखिये लिस्ट सर-

१.डॉ. कमल (मनोचिकित्सक) वापिस आ पाए थे. २. सरिता बेन (गृहणी) ३.राजा (विद्यार्थी) ४. बिल्लू (विद्यार्थी)वापिस आ गया था ५. सोनिया(कॉल सेंटर कार्यरत ) ६. सजग सिंह (क्लेर्क) ७.हिमांशु शेखर (इंजिनियरिंग का विद्यार्थी) वापिस आ गया है, और अभी जिन्दा है. ८.निवेदिता (बी.ऐ. ३ यर.)

इसमें जो हिमांशु..बचा है..वो बहुत ही ज्यादा बुरी तरह डरा हुआ है. और बस नागराज..ध्रुव चिल्ला रहा है. अभी तक येही सब पता चला है.

“ठीक है फिर इस खबर की ब्रोडकास्टिंग शुरू करो..ध्यान रहे लोगों को ज्यादा डरना नहीं है..क्यूंकि जब तक पूरी सच्चाई का पता नहीं चल जाता हम रिस्क नहीं ले सकते.”

“भारती मुझे भी चलना पड़ेगा..तुम को पता...”

“हा..जाओ और फ़टाफ़ट मामले की तह तक पहुँचो.

कॉम्पटीशन सिर्फ आम आदमी में नहीं..बल्कि सुपर हीरो में भी बढ़ा है. इन कुछ सालों में नागराज ने अपने अंदर काफी इम्प्रोवेमेंट किया है..अपनी इच्छाशक्ति को और मजबूत बनाया है..अपनी आत्मिक शक्तियों को जागृत करके..अपने मन और दिमाग को सयम में करना आदि.

नागराज हिमांशु के घर पर..

“आइये नागराज जी, देखिये न मेरे बेटे को या हो गया है?” नागराज ने उसके पास जाकर देखा उसकी आँखें गोल फटी हुई बहार आने को तरस रही थी..लग रहा था कोई बुलबुला है जो अभी फटेगा और खून की धार बह निकलेगी. उसका मुह सिर्फ दो शब्द ही बोल रहा था..नागराज..ध्रुव..बस. नागराज ने तुरंत सम्मोहन शक्ति का प्रयोग करा..और हिमांशु ने बोलना चालू किया. “परसों की बात है मैं और मेरा दोस्त कॉलेज से वापिस आ रहे थे..मैं वहाँ एक बुक-सेलर के पास रुका कॉमिक्स लेने.और मेरी नज़र वहाँ एक काली किताब पर पड़ी.दोस्त के मना करके के बावजूद मैंने उसे खरीद लिया. और घर आकार रात को ही पढ़ने के लिए खोल दी..पता नहीं उसे खोलते ही मन में अजीब बैचैनी होने लगी...वो बुक में खोली और पढ़ना चालु किया..बड़ी अजीब बात लिखी थी उसमें..एक लड़की चमकती आँखें..सुंदर शरीर..सुन्हेरे बालो जरा सोचो तो कैसी होगी? मैंने इतना सोचा की मेरे चरों तरफ का सीन ही बदल गया...मुझे सामने ५ घर दिखाई दिए..जैसे ही मैंने आगे कदम रखा..मेरे मुह पर किसी ने कटा हुआ हाथ फेंका..लेकिन मैंने सोचा की ऐसा कुछ नहीं है सब वहम है..लेकिन जो सीन में आगे देखा तब मुझसे रहा नहीं गया. एक औरत एक बच्चे की आंखें फोड कर खून पी रही थी..ये देखकर में चिल्लाकर वापिस भागा..एक दरवाज़ा बंद हो होने वाला था लेकिन में निकल ही आया.”

उसके मुह से ऐसी कहानी सुनकर नागराज अचंभित रह गया वहीँ घरवाले बुरी तरह रोने लगे. “वो काली किताब कहाँ है? जो तुम लाये थे.”

“पता नहीं नागराज ..अब यहाँ कोई ऐसी किताब नहीं है” हिमांशु का भाई बोला जिसने पहले उसके हाथ में काली किताब देखि थी.

“हम्म..ओह्ह. सौडंगी हाँ बोलो..तुमने बाकी लोगों के घर पता करा? क्या? कोई काली किताब देखि थी जो अब नहीं है..ठीक है तुम वापिस आ जाओ.”

यानि इस कहानी का रहस्य का मुख्य कड़ी वो काली किताब ही है..अभी अपने जासूस सर्पों को इसके बारें में सूचित करता हू.

कुछ चीज़ें होती है ऐसी जिन्हें हम नहीं देखना चाहते न सुनना और न महसूस करना...पर वो सरसराती हवाएं...हमें धकेल जाती उन जगहों पर होनी होती हैं वो अनचाही घटनाएं घटनी होती हैं. आदमी कितनी ही कोशिश कर ले..पर रोक नहीं पाता अपने कदम.

“ ध्रुव उठ बेटा! जल्दी तैयार हो..आज श्वेता आने वाली है न..तुझे उससे लेने जाना है !”

ध्रुव हडबडाकर उठ जाता है..सामने देखता है तो श्वेता खड़ी थी. “अरे तू आ गयी..तेरी फ्लाईट तो ९ बजे की थी न फिर...”. “ही ही...बेवक़ूफ़ बनाया..मेरी फ्लाईट ६ बजे की थी.” एक आम भाई-बहन की तरह ही रिश्ता है इन दोनों का कुछ स्पेशल जरूर है दोनों भाई-बहन सुपर हीरोस हैं.

“अच्छा भैया मेरे बुक्स मंगा ली क्या?”

“अरे अभी तो आई है...मिल जाएगी पीटर लेने गया है..शाम तक ले आएगा.”.

महानगर में:

नागराज घूम रहा है राज बनकर..कहीं शायद उस किताब का पता चले. तभी उसे जासूस सर्प का सन्देश आता है. “नागराज..एक लड़का घुंघराले बालों वाला, लंबा, सामने किलक बुक स्टोर से तुम्हारी बताई जैसी किताब लेकर महानगर और राजनगर को जोड़ने वाले हाइवे से राजनगर जा रहा है.”

तुरंत राज नागराज बना...अब धीरे धीरे उसने अपनी शक्तियों को इस्तेमाल करना सीख लिया है. अब उसे कपडे उतरने की जरुरत नहीं पड़ती वो अपनों नयी शक्ति..या कहें जागृत शक्ति स्वयम शक्तिके सहरे अपने इष्ट देवता कालजयी को याद करते ही नागराज के रूप में आ जाता है.

नागराज अब उस इंसान के ऊपर था..और वो देखना चाहता था की वो जा कहाँ रहा है. “ ओह! नहीं ये तो ध्रुव के घर जा रहा है....आखिर ये है कौन?” ; “अरे भारती का मेसेज आ रहा है...”

“नागराज जल्दी हिमांशु के घर पहुँचो..उस पर हमला हो रहा है.”

नागराज अब क्या करे? हाँ एक तरीका है तो उसके पास..नागु को इस आदमी के पीछे लगा देता है..और खुद जा सकता है हिमांशु को बचाने. हाँ येही करना होगा इसे.

नागराज वापिस महानगर पहुंचा..हिमांशु को बचाने. हिमांशु के घर में अजीब ही माहौल है. कोई है नहीं पर फिर भी कोई हिमांशु को मार रहा है..”ओह्ह कोई उस पर चाकू फैंकने वाला है बचाना होगा इसे..मुझे बिच में आना ही होगा.”

“कौन है तू...हट जा..इस लड़के को सजा मिलेगी ही...इहिही...” चटाक एक जोरदार थप्पड़ ने नागराज को दूर फैंक दिया.

“आखिर है कौन यहाँ?..हम्म मुझे अपनी सर्प शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा..जिह्वा शक्ति..जो किसी सर्प को आँख न होने पर भी महसूस करा देती है. अरे यहाँ पर तो १ ही का पता चल रहा है..और वो हिमांशु है., समय आ गया है की मैं बाबा गोरखनाथ की सिखाई हुई आत्मिक शक्ति का प्रयोग करू...नागराज अपने मानस रूप में आता है..हे देव कालजयी..मेरा सोचना सही निकला ये तो एक प्रेत है, पर ये आया कहाँ से? उफ़ ये सब बाद में ...बाबा ने बताया था की प्रेत को अगर किसी दैवीय शक्ति से छुआ दो तो ये खतम तो नहीं पर भाग जरूर जाते हैं...क्या??

राजनगर में नागु:

“अब अंदर तो वो चला गया! मैं कैसे जाऊं? अरे हाँ..मैं कमांडो फोर्स का कैडेट बन जाता हू..पीटर.ही ही...कैप्टेन. तुमक जरूरी खबर देनी है.वाह! क्या एक्टिंग है?”

नागु पीटर बन कर अंदर घुसता है. “कैप्टेन एक जरूरी खबर है.”

“हाँ..पर ..अरे तुम तो श्वेता के कमरे में सूट में थे न..इतनी जल्दी कैडेट्स के कपड़ों में कैसे आ गए?

“मरर..गया ..वो लड़का पीटर ही था क्या?? अब असली रूप में आना ही पड़ेगा.”

“अरे तुम..क्या बात है?”

नागु ध्रुव को साडी बातें बताता है. ध्रुव तुरंत श्वेता के कमरे की और भागता है.

“हुफ्फ़..शुक्र है तुमने अभी तक किताब नहीं खोली”

“क्यों क्या है इसमें?”

“नहीं.......रुको.......मत खोलना इस किताब को शापित है ये.....”

ध्रुव की इतनी जोर से चिल्लाने से श्वेता डर गयी और उसके हाथ से किताब छुट गयी.

इधर नागराज प्रेत से लड़ने में व्यस्त है. कहते तो सभी है..भूत-प्रेत कुछ नहीं होता सब वहम होता है. पर जब ये सामने आ जाते हैं तो हवा सरक जाती है. मन को कितना ही स्थिर कर लो ये सामने से हटती नहीं हैं.

भक्क..से प्रेत ने नागराज के शरीर पर काबिज होने के लिए दौड़ा ..इतना अच्छा मौका कैसे छोड़ सकता है? नागराज फंस चूका है..खुद को बचाए या हिमांशु..कितना आसान है न..कुछ पल में सब कुछ बदल गया...इससे अच्छा तो नागपाश और गुरुदेव होते तो चल जाता. आखिर करू क्या?

“ह..हिमांशु..आह व.वो..शिवजी की मूर्ति मेरी तरफ फैंको..”

काम कर गयी युक्ति..आत्माएं हमेशा से ही इन चीज़ों से डरती आई है. आर्घ्ह्ह ....मैं फिर अओऊंगा..इहाहा

जान बच गयी.

हिमांशु तो सही है पर अब मुझे अपने पर शर्म आ रही है..नागराज होने के बावजूद में अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कर पाया. कुछ करना होगा! ध्रुव के घर जाना चहिये.

ध्रुव के घर में पहले ही सब नागराज का इन्तेज़ार कर रहे थे.

“आओ..नागराज..वो आदमी पीटर ही था..जो किताब लेकर जा रहा था.” नागु ने बोला.

“हम्म..नागराज..तुम्हारा भी अभी मुझे भारती से पता चला..सब सही है न!”

“कुछ भी सही नहीं है ध्रुव, मैं अभी एक आत्मा से लड़कर आ रहा हू..ऐसा लगा की मैं नागराज नहीं कोई आम इंसान हू.., खैर इसे छोडो..अभी तो बला टली..अब ये बताओ इस किताब का कैसे करें?”

“मैंने कुछ सोचा है नागराज, सबसे पहले हमें..उस किताब बेचने वाले के पास जाना चहिये..उसे ये बुक कहाँ से मिली और..सबसे बड़ी उसके पास ये बुक एक ही आ रही है..या कोई उसे पैकज में सप्लाई कर रहा है. अभी तो दूकान बंद हो गयी होगी. कल सुबह चलते हैं.”

अगली सुबह ध्रुव और नागराज तैयार होकर निकल पड़ते हैं.

दूकान पर: आओ साहब! क्या चाहते हो?

“एक किताब ढूंड रहे हैं...नाम तो पता नहीं..पर दिखने में..काली है पूरी..ऊपर एक सर्कल और त्रिभुज है. मोटी भी है थोड़ी...”

दुकानदार कुछ सोचने लगता है...”अहह..साहब ऐसी तो कोई किताब नहीं है..”

“अरे होगी देखिये न..हमारा दोस्त कल लेकर गया था..ये देखिये ये रहा...”

ध्रुव पीटर को आगे कर देता है.

“अरे...साहब इन्हें तो मैंने इलेक्ट्रोनिक्स और साइंस की बुक दी थी..और कौनसी थी?”

“अरे...सुबह-सुबह तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? तुमने ही तो जबरदस्ती दी थी की साहब ले जाओ..पढ़ना अच्छी लगे तब पैसे दे देना. पता तक नहीं लिया था तुमने..”

“अरे ..अजीब जबरदस्ती कर रहे हैं आप लोग...”

तभी वहां रेनू आ जाती है. “कैप्टेन तुम्हारा शक सही निकला सभी आठ लोग किताब इसी से लेकर गए थे.”

“कैप्टेन?...कौन हैं कौन आप लोग?”

ध्रुव और नागराज ने अपना मेक-उप उतरा...”तुम्हारे चाचा”

नागराज ने उसे कोल्लर से पकड़ लिया..”बता बे..क्या चक्कर है ये? वरना जान से जाएगा “

“नागराज जी...छोड़ दीजिए...मैं कुछ नहीं जानता...सच में...”

“तू ऐसे नहीं बताएगा...ताडक सर्प...”

“न..नाहीईई ..बताता हू..मुझे ज्यादा कुछ नहीं पता मैं रोज ये किताब किसी को दे देता हू..वो ले जाता है अगले दिन वो किताब मुझे वापिस मिल जाती है एक कागज के साथ जिस पर लिखा होता है..की किसी को भी ये किताब दे दो..अगर नहीं दी थी या इसे फैंकने की कोशिश की थी बचोगे नहीं..और साथ में २००० रूपए भी आते थे. पर आज अभी तक नहीं आया..पता नहीं क्यों?”

“वो इसलिए ...क्यूंकि किताब अभी तुम्हारे चाचा के पास है!”

नागराज ध्रुव और कमांडो फोर्स ..जा चुके थे पर दुकानदार की हालत अभी भी खराब थी.


ध्रुव के घर पर:

“वो अच्छा है भैया मम्मी-पापा वैष्णो देवी गए हुए हैं...वरना उन्हें तो बेकार की परेशानी होती.”श्वेता ने कहा. “वैसे भैया कोई आईडिया आया इस काली ब्लैक बुक के बारें में..क्या करें इसका?”

“समझ नहीं आ रहा..इसे खतम करने की नहीं सोच सकते , क्या पता क्या हो जाए?”ध्रुव का दिमाग चल रहा था नहीं चल रहा था कुछ समझ नहीं आ रहा था. “हाँ! वही इसके बारें में बता सकती है !, मैं अभी आता हू.”

आत्माओं का खेल भी अजीब होता है न! कब हवाएं दगा दे जायें..कब कौनसा खेल खेल जाती है? पता ही नहीं चल पता. शायद आजकल फुर्सत में है जो नागराज और ध्रुव से भिड़ने की योजना बना रही हैं. “अगर ये दोनों मेरे जाल में फंस जायें तो..हाहहाहा”

कुछ घंटों बाद ध्रुव लौटा और वो अकेला नहीं था उसके साथ लोरी थी. लोरी ऐसी मुश्किलों में काफी अच्छी मदद साबित होती है. इन चीज़ों की उसे काफी जानकारी है.

“हम्म..रस्ते में ध्रुव ने मुझे सब बता दिया, और मुझे लगता है की ये कोई सीधा मामला नहीं है. तुम लोग भले ही राक्षसों से टकरा चुके और उन्हें हर चुके हो पर ये आत्माएं हैं..न तो दिखती है न काबू में आती है..इसलिए मैं चाहती तो येही हू की तुम इस पचड़े में न पडो पर जानती हू तुम मानोगे नहीं.इसलिए मैं कुछ तयारी करना चाहती हू तब तक कोई इस किताब को मत छेडना.”

लोरी की बात मानकर सब बाहर चले जाते हैं.

“भैया क्या मैं भी साथ चलूँ?”श्वेता ने पूछा तो ध्रुव ने सीधा ही मना कर दिया. क्यों न करे आखिर उसकी एकलौती बहन है..और वो भी इतनी प्यारी..पर क्या ये सब सही जा रहा है? ऐसा लग रहा है जैसे नागराज और ध्रुव किसी स्पेस मिशन पर जा रहे हैं ब्रह्माण्ड को बचाने, नहीं?

“ध्रुव तुम्हे क्या लगता है? हमें और कुछ तयारी करनी चहिये इस किताब की दुनिया में जाने से पहले?”

“नहीं नागराज! वहाँ मुझे नहीं लगता कुछ काम करेगा...हम अभी खुद पर भी भरोसा नहीं कर सकते की खुद कुछ कर पायेंगे भी या नहीं!”

तभी लोरी की आवज़ आई और उसने सबको अंदर बुला लिया.

“ध्यान से सुनो..ये किताब कोई किताब नहीं है...असल में ३५७५ साल पहले..एक तांत्रिक द्वारा बनाया गया..रास्ता है जो आत्माओं या कहो बुरी आत्माओं की दुनिया से हमारी दुनिया को जोड़ता है. उस समय तो एक तपस्वी ने अपनी साधन शक्ति से इसे छुपा दिया था..पर आज अचानक ही फिर से सामने आ गयी है. जो थोडा बहुत पता है इसके बारें में बताती हू..इसके अंदर की दुनिया ज्यादा बड़ी नहीं है..बस ५ घरों में बसी हुई है...अलग घर, अलग आत्माएं, अलग स्वभाव, अलग नियम..और चारों तरफ सिर्फ कंकाल हैं...मिटटी में धंसे हुए मांस के टुकड़े...खून से सनी जिन्दा लाशें..ये वही लोग है जो घर में नहीं गयी और न ही वापस यहाँ आ पाई. तुम्हे अंदर भटकने की बहुत जगह और भटकाने के लिए आत्माएं मिलेंगी पर उन पर ध्यान मत देना तुम्हारा अहम मकसद उन घरों का रहस्य सुलझाना है..अगर ऐसा कर दिया तो समझो..ये किताब खतम..किस्सा खत्म. कैसे खतम होंगे ये तुमको ही देखना होगा. कुछ खास बातें याद रखना जैसे..किसी खुशबू, आवाज़ को ध्यान में मत लगाना..पीछे मत मुडना...और अगर कोई भयानक दृश्य दिखाई दे तो अनदेखा कर देना..जानती हू तुम्हारी इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है..पर फिर भी..ये सब उनकी फंसने की चाल होती हैं. और अंत में ये लो..मंत्रित ओम..ये तुम्हें..बुरी आत्माओं से बचाएगा पर कुछ समय के लिए. जैसे जैसे इसकी चमक कम होती जाएगी ..आत्माओं का प्रभाव तुम पर बढ़ता जाएगा. अगर उन्होंने तुम्हारे मानस शरीर पैर कब्ज़ा कर लिया तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा..इसलिए संभलके, बस इतना ही है!”

“नागराज तैयार हो?”; “पूछने की जरुरत नहीं ध्रुव..किताब पढ़ो”

“किताब खुलते ही..हवा चली..और ध्रुव ने किताब के पहले पन्ने से २ लाइन पूरी करी..पलक झपकते ही दोनों सो गए.

भूत प्रेतों की दुनिया कैसी होती होगी ? हमारे जैसे घर, गाडियां..टीवी तो नहीं होता होगा..टाइम पास कैसे करते हैं वो? क्या उनकी दुनिया में रौशनी है? हम्म नहीं लगता तभी तो रौशनी से वो इतना दूर भागते हैं..अँधेरा और सुनसान जगह ही पसंद है इन्हें, आज कल की जेनरेशन जैसे हाई बॉस डी जे म्यूजिक नहीं...हाहा! यहाँ कोई स्पेशल एफ्फेक्ट नहीं होता...बस एक एफ्फेक्ट होता है..मौत का इफ्फेक्ट..बस! नागराज ध्रुव का भी नया सफर शुरू हुआ है...मौत से मिलने का अलग तरीके से...खैर अब तक तो वो पहुँच ही गए होंगे.

दरवाज़ा खुला और लोरी, श्वेता, पीटर अंदर आ गए है...पर जो उन्होंने देखा उस पर यकीं ही नहीं हुआ...

“य..ये क्या हो गया?”लोरी चिल्लाई..”हे भगवान!”

“क्या हुआ लोरी? क्या हुआ?” श्वेता को चिंता बढ़ने लगी थी.

“श्वेता बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है..ये देखो दोनों के शरीर ही गायब हैं...यानी यानी..वो शरीर के साथ ही किताब की दुनिया में चले गए...उफ़ ये न तो उनके लिए अच्छा है न यहाँ की दुनिया के लिए, ऐसा जरूर इसलिए हुआ होगा..क्यूंकि उनमे सत्य शक्ति बहुत ज्यादा है..मानस रूप तो खिंचा नहीं जा सका तो शरीर ही खिंच लिया.....लेकिन..लेकिन..ध्रुव ने जाते जाते भी सही काम कर गया...मेरा बनाया सुरक्षा चक्र उसमे ये किताब फैंक गया..येही उनके आने का रास्ता है..अगर ये गायब हो जाती तो..उनका आना नामुमकिन हो जाता!”

सही बात है भाई..आत्मा से आत्मा ही टकराए तो सही है...ऐसे मामलों में आदमी का शरीर उसका ही दुश्मन बन जाता है..सोच, शक्ति सब सिमट जाती है..क्यूंकि लड़ने वाला का पूरा ध्यान अपने शरीर को बचने में निकल जाता है..चोट लगेगी दर्द होगा..ध्यान बंटेगा!

किताब की दुनिया:

नागराज और ध्रुव का शरीर मिटटी में पड़ा हुआ था!..कुछ देर बाद उन्हें होश आया तो..सीन देख कर उनके होश ही उड़ गए...चरों तरफ से उन्हें लाशों ने घेर रखा था..जिन्दा लाशें! कंकाल ही दिख रहा था उसपर मांस के टुकड़े लटके हुए थे..जैसे फटे चीथड़े भिखारी पहनते हैं. किसी के हाथ में पत्थर, किसी के में कुल्हाड़ी..लगता है आदमी का मांस उन्हें बहुत ज्यादा पसंद है...तभी एक ने नागराज के माथे पर पत्थर मारा!..नागराज के मुह से आह निकली..

“अरे मुझे दर्द क्यों हुआ?..हम तो शरीर के साथ आयें हैं...लोरी ने कहा था की सिर्फ मानस रूप ही जाएगा!?”

“कुछ गडबड है...पर अभी यहाँ से कैसे निकले!?”

“ये मुझ पर छोडो ध्रुव...अब मैं अपनी शक्तियों का तुम्हे विस्तृत रूप दिखता हू..”

नागराज ने हवा में एक जगह ध्यान लगाया और वहां पर एक रौशनी दार गोला बना और फट गया..जिसने लाशों में से जिन्दा शब्द हटा दिया. चूँकि दोनों निचे लेटे हुए थे..उन्हें विस्फोट कुछ नहीं कह सका.

“अरे नागराज ये तुमने कैसे किया?”

“कुछ नहीं ध्रुव अपनी ध्वंसक सर्पों की शक्ति को आत्मिक शक्ति से मिलाया..और हवा में ही सभी कणों को जोड़कर एक गोला बनाया और अपनी ही एनर्जी से उसे फोड दिया..”

“हम्म..नागराज अब हमारे पर डबल जिम्मेदारी आ गयी है..एक तो यहाँ इस दुनिया को खतम करके अपनी दुनिया बचानी है..और दूसरा अपने शरीर को बचाना है..और अब यहाँ पता नहीं..कैसे कैसे खतरे आयेंगे. चलो आगे चलकर देखते हैं..”

“कैसे जायें जरा रास्ता तो देखो..किसी की टांग बाहर दिख रही है..किसी के हाथ और किसी का आधा कटा चेहरा..ऐसे जगह को देखकर तो किसी को भी दिल का दौरा पड़ जाये.”

इहिहिही यहाँ आ तो गए...जा नहीं पाओगे...हर कदम पर मौत है इहिहिही..

कर्च कर्च...पत्तों के सरकने की आने लगी..ध्रुव ने ऊपर देखा! “नागराज बचो!...” ऊपर से एक तेज धार कुल्हाड़ी आ रही थी...जो नागराज को १ पल में चिर देगी. नागराज तुरंत इच्छाधारी कणों में बदला..कुल्हाड़ी कणों को चिर गयी...

“आह....अआर्घ्ह......नाग्शक्ति...मदद!”अचानक ही नागराज की बेल्ट इच्छाधारी कणों में ही बड़ी होने लगी..ध्रुव को कुछ दिख ही नहीं रहा सिर्फ आवज़ आ रही है. कुछ सेकंड बाद नागराज सामने आया.

“क्या हुआ था नागराज तुम्हे?”

“ध्रुव यहाँ जितना हमने सोचा है उससे ज्यादा ही खतरा है...इस कुल्हाड़ी ने तो मुझे इच्छाधारी कणों में ही काट दिया था..वो तो अच्छा है की अब मैं पहले से ज्यादा देर तक ऐसे रह सकता हू..वरना मेरा सफर तो येही खतम हो जाता.”

“चलो नागराज अब आ ही गए..तो अब कुछ और कर भी नहीं सकते.”ध्रुव के चेहरे पर भी शिकन के भाव नज़र आने लगे थे जबकि ये तो बस मुश्किल से १० कदम चले होंगे. नागराज को अपने से ज्यादा ध्रुव की चिंता था..यहाँ पर ध्रुव कम से कम अभी अपनी कोई ट्रिक तो नहीं चला सकता था. नागराज इसी सोच में दो कदम आगे हो गया.

“ओह्ह..नागराज...शीट किसी ने निचे से मेरा पांव पकड़ लिया है...”ध्रुव ने स्टार ब्लेड निकली हाथ काटने के लिए पर ये क्या जादू है ध्रुव जितना निचे झुके हाथ को काटने हाथ उससे ही उठा दूर हो जाये..जबकि पैर तो येही है...” हाहा हा ध्रुव भी आखिर फंस गया न! नागराज ध्रुव की आवाज़ सुनकर चौंका..और जैसे ही पीछे मुड़ने लगा..

“नहीं नागराज पीछे मत मुडना..हम दोनों के बिच में कुछ है.....”

“अब मैं तुम्हे फिर कैसे बचाओं?” दोनों बेबस हो गए..इतनी जल्दी!

“नागराज इच्छाधारी शक्ति का प्रयोग करके मेरे पीछे आ जाओ..”

गुर्र...ये लड़का...बचेगा नहीं तू..इहिहि....

नागराज ने तुरंत ध्रुव को आज़ाद कराया..

“अब क्या करें ध्रुव कैसे बढे आगे?..”

“नहीं नागराज! रुको मत वो देखो सामने तीन घर!..येही का बताया था लोरी ने.दोनों चल पड़े घरों की तरफ.

मौसम ऐसा है की कभी भी बारिश हो सकती है...बिजली कड़क रही है..रौशनी के नाम पर बस कुछ मशालें जल रही हैं. यहाँ लगता है रोज ही अमावस्या रहती है..

उफ़ ये शरीर ..इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है..लगता है कोई बोझ ढो रहे हैं..ऊपर से इसकी भूख प्यास.

“अरे ये तालाब कैसा!..?कुछ हो रहा है मुझे इसका पानी पिने का मनन कर रहा है..”नागराज बोला..ध्रुव ने भी हामी भरी..दोनों झुके

“नहीं....”दोनों एक साथ चिल्लाये...खतरा है न..इच्छाशक्ति फिर जीत गयी..अभी ऐसे बहुत इम्तेहान आयेंगे...तभी पानी में एक शोर सा उया और एक हरे रंग का प्राणी बाहर हवा में उछला और उन पर गिरने वाला था..पर ध्रुव के स्टार ब्लेड ने उसे वापिस पानी में गिरा दिया.

शीशे का घर:

दोनों आगे बढे ..और खोला पहले घर का दरवाज़ा!...और हा हा भूत भी मजाक करते है पहली बार देखा..दरवाज़ा खुलते ही उनके पर पिचकारी मार दी...दोनों एक दुसरे को देखा और अंदर घुस गए..अंदर गए तो पूरा महल हाँ महल ही कह सकते है इसे..रौशनी से जग मग हो रहा है..और अब पता भी चल गया की उन पर पिचकरी से क्या फैंका था..खून की पिचकारी थी वो..जिसमे चिपके हुए थे..खाल के टुकड़े, आँखें..जैसे कोई जेल हो...उफ़ ऐसा घिनौना रूप उन्होंने अपना कभी नहीं देखा था..उपर से ये जेल खून जो भी था हट ही नहीं रहा था..

“कमाल का घर है न नागराज..पुरे घर में रौशनी और शीशे ही शीशे...हर चीज़ शीशे की...”

“पता नहीं ध्रुव, मेरी सर्प इन्द्रियाँ कुछ होने की आशंका दे रही है..”

“हम्म..अरे दरवाज़ा कहाँ गया? यहाँ पर भी शीशा आ आया है...समझ गया वही जो हमारे साथ हमेशा होता आया है, हम फंस गए हैं!”

“अब करें क्या?यहाँ..कोई दिख भी नहीं रहा!”

शू..जैसी आवाज़ निकली ..दोनों ने घूम कर देखा.कुछ था पर क्या था?...

अच्छे फंसे दोनों...दुनिया को बचाने हमेशा इन्हें ही क्यों जाना पड़ता है आगे? ब्रह्माण्ड रक्षक नाम क्यों रखा है फिर?

नागराज निराश सा होकर शीशे की टेबल पर हाथ रखकर उसमे अपनी शक्ल देख रहा होता..है तभी एक नीला रंग का हाथ टेबल से बाहर निकलता है और नागराज का गला पकड़ लेता है...और जोर से टेबल पर पटकता है...टेबल टूट जाती है...ध्रुव खड़ा बस देखता ही रहा. सब इतनी जल्दी हुआ की कोई कुछ कर ही नहीं पाया.

“आह...अब ये क्या था?नयी मुसीबत?”

“नागराज ये शायद इस घर का असली प्रेत है...जिसे हमें खतम करना होगा..वो भी जितना जल्दी हो सके..पर पहले इसकी शक्तियों का राज़ जानना होगा..”

अहहाहा लड़के तू ये कभी पता नहीं लगा पायेगा...ये ले..इतना कहते ही उसने ध्रुव को पीछे से पकड़ा और शीशे में घुसाने लगा..ध्रुव कमर तक अंदर जा चूका था..नागराज ने तुरंत उसे पकड़ा और खिंच लिया..

“हुफ्फ़..फिर बचे!, ये क्या मुसीबत है? ध्रुव कुछ सोचो..मेरा तो सर अभी तक झन्ना रहा है.”

“मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा नागराज! सोचू भी तो क्या..पर हाँ इसकी एक शक्ति समझ आ रही है ये शीशे..इन्ही की मदद से वो अंदर बाहर आता रहता है. एक काम करो नागराज ३ साइड के शीशे तोड़ दो..ताकि हम एक ही दिशा में ध्यान दे सकें.

नागराज ने तुरंत वही किया..अपने ध्वंसक सर्पों को शीशे पर निशाना लगा कर छोड़ा पर ये इतना आसान नहीं है..सारे ध्वंसक सर्प शीशों के अंदर चले गए ..दोनों उस दिशा में मुड गए..गलती...पीछे के शीशों से सर्प बाहर निकले पैर अब वो उस प्रेत के कब्जे में थे..सो पीछे से वार किया दोनों पर..अब इस घटना को ही वो समझ नहीं पाए थे..की अब ये सर्पों का हमला..यहाँ से तो लगता है इनकी मौत भी इन्हें बाहर नहीं ले जा सकती..ऊपर ये खून चिपका हुआ परेशां कर रहा है.

“सुनो नागराज मेरे पास एक आईडिया है..मैं इसे उलझता हू तुम एक दम मेरे सामने आकर उससे सम्मोहित करना..शायद बात बन जाये..पर अब हमारे पास और कोई भी जा नहीं पा रहा है, इसे भी इस्तेमाल कर लेते हैं.”

ध्रुव एक शीशे के सामने खड़ा हुआ और प्रेत को उकसाने की कोशिश करने लगा..अचनक प्रेत शीशे में सामने आया..जिसे देखकर अछे अछे गश खाकर गिर जाए. चेहरे में आधी खोपड़ी..आधी टूटी हुई..आँख बहार लटक रही है..उसकी घिनौनी सी हंसी...ध्रुव को भी भगवान को याद करने के लिए मजबूर कर रहा था. नागराज सामने आये और उसे सम्मोहित करने लगा...पर जरा बताओ तो..हवा को कोई सम्मोहित करता है क्या?..येही हुआ वो उड़ गया..शीशे में नागराज ही था..उसने खुद को ही सम्मोहित कर लिया था. और धीरे धीरे शीशे में खिंच गया.

ध्रुव डर गया...उसके चेहरे पर डर आने लगा..पसीने आने लगे....पर पर ध्रुव हंस रहा है....ध्रुव हंस रहा है..”हा हा हा नागराज फंस गया न तू...ध्रुव के दिमाग से कोई नहीं खेल सकता...हा हा सम्मोहन...चाल थी वो मेरी...फंस गया तू...अब भुगत...धुआं सा उठा और ध्रुव कहीं नहीं था उसकी जगह वो ही प्रेत खड़ा था. अगर ध्रुव ये था तो ध्रुव कहाँ है? और बदला कब?

आओ..देखें..कहाँ है ध्रुव...ये देखो...ये हैं..मौत की बेदी...ध्रुव बहुत सो लिया था उठ अब...

“आह...ध्रुव के मुह पर खून के छींटे मारे गए...”नागराज नागराज...”

“हाहा भूल जा उसे...मर गया वो...हा हा और अब तू भी मरेगा क्यूंकि तेरी बलि से हमारे प्रेत आका गजी को मिलेगी असीम ताकत जो दुनिया पर कब्जा करने में बहुत मददगार होगी...”

“कहाँ है तुम्हारा आका..सामने लाओ उसे..”

“च्च्च..बेचारा ध्रुव मेरे ख्याल से तू इतना बेबस तो कभी नहीं हुआ होगा न!..पर माफ करना भाई आका से तुम मिल नहीं सकते वो अभी है ही नहीं यहाँ...वो तो तुम्हारी दुनिया में..हैं.”

ये हुआ कब? कब बदला गया ध्रुव? कब छोड़ दिया उस प्रेत को नागराज के साथ..?फ्लाश्बैक..

तुम्हे ध्यान है जब ध्रुव का पर किसी हाथ ने पकड़ लिया था? नागराज पीछे मुड नहीं सकता था.बस तभी बदला गया ध्रुव.

ध्रुव सोच रहा था बचने का कोई उपाए..कोई आईडिया , कोई मदद...कुछ तो होगा ..

“ध्रुव तुम कुछ नहीं सोच सकते ...जानते हो क्यों? हा हा क्यूंकि हमने तुम्हारी सोच को ताला लगा दिया है. वो देखो उस शीशे के कटोरे में..तुम्हे अपनी सब जानी पहचानी यादें नज़र आएँगी ..वोही तुम्हारी सोच है...इसलिए तुम नहीं सोच पा रहे...”

“ऐसा नहीं हो सकता कोई किसी की सोच निकाल नहीं सकता. कभी नहीं!..हाँ ये जरूर मुझ पर हावी हो रहे हैं. ताकि मैं कुछ सोच न पाऊं ..और मारा जाऊं ...मुझे कुछ सोचना होगा..हवा को धोखा देना होगा!”, “पर मैं ये बंधा कैसे हुआ हू? न कहीं रस्सी है न कहीं जमीन है! खोल भी नहीं सकता इन्हें..अरे ये आग! ये ये बात बना सकती है...ध्रुव मुश्किल से खिसकता हुआ गया और अपने हाथ जलती हुई आग पर लगा दिए..और वैसा ही हुआ जैसे ध्रुव ने सोचा था...बस अब मौका देखकर भागना है.”

अचानक आसमान में एक चिन्ह बनने लगा...सब की नज़र ऊपर चली गयी..उसी वक्त कहीं से एक ओम आता है और वो सब आत्माओं को झुलसा जाता है..सारे भूत-प्रेत..इधर उधर दौड़ने लगते हैं..ध्रुव की नज़र भी उस ओम पर पड़ती है...

“अरे ऐसा ओम तो मेरे पास भी है...म..मेरा ओम कहाँ है?”

“ये रहा..ध्रुव..”

ध्रुव ने पीछे मुड़कर देखा..तो उसका चेहरे पर खुशी बढ़ने लगी..सामने नागराज खड़ा था.

“नागराज तुम जिन्दा हो...वो कह रहे थे की तुम्हे मार डाला...”

“ऐसा सच हो सकता था..अगर मैं उस समय ध्यान नहीं देता की मेरे साथ ध्रुव नहीं वो प्रेत है तो..कुछ जगह मुझे शक हुआ जैसे वो एक दम बिच में खड़ा था पहले घर में रौशनी के पास जा ही नहीं रहा था.., और सबसे बड़ी बात ध्रुव कभी भी अपनी जान बचाने के लिए मेरी जान नहीं देगा ये मैं जानता था..और घर में घुसते हुए तुम पैर मतलब उस प्रेत पर और मुझ पर खून की बौछार की गयी थी..वो खून मुझ पर से तो उतरा नहीं पर उसके ऊपर से उतर गया..बस तभी में समझ गया की ये कोई और है..और मैंने मौका देख कर नागु.. को नागराज बना डाला..और खुद एक सर्प बनकर कोने में छुप्प कर देखता रहा..उसने सोचा उसने मुझे फंसा लिया..बस ये सोचकर उसने घर का रास्ता खोल दिया..इधर मैं आ गया तुम्हे बचाने और उधर नागु ने अपनी मणि शक्ति से उसका शीशों का घर तोड़ दिया..पर अभी काम बाकी है हमें घर खतम करना है और उस घर को भी...इसलिए अब जल्दी चलो!”

दोनों भागते हुए कमरे में घुस गए...और देखा तो सिर्फ एक हाल बचा था..जिसके चारों तरफ शीशे ही थे बस! अब उनका काम था उस प्रेत को निकालना और इस घर को खतम करना..

“ध्रुव अब इसे खतम करने का जिम्मा मैं तुम्हे सौंपता हू..कोई तरीका ढूँढो जल्दी.., आह”

प्रेत ने अपने हमले शुरू कर दिए..खून की बूंदें टपकने लगीं..

“नागराज तुम सामने वाले शीशे के साथ रहो..वो प्रेत मुझे कट लगाकर सामने के शीशे में जाना चाहेगा तुम फटफट उस शीशे को पलट देना ...”ध्रुव ने नागराज के कान में बोला.

नागराज तैयार था..प्रेत निकला ध्रुव को छिला और सामने वाले शीशे में घुसने लगा..पर तभी नागराज ने शीशा मोड दिया..आह! प्रेत को जैसे चोट लगी..वो हडबडा कर साथ वाले शीशे में घुस गया. अब उन्हें इसकी कमजोरी पता लग गयी थी..

अब ध्रुव ने असली बात नागराज को बताई..नगराज ने सहमति में सर हिला दिया...नागराज ने नागु को बाहर निकला और उससे कुछ सर्प बनाने को कहे..और उन्हें हर शीशे के साथ खड़ा होने को कहा..और हर शीशे को थोडा अंदर लाने को कहा...ध्रुव बाहर हो गया..नागराज अंदर था..बस अब एक मौका चूकना नहीं चहिये.प्रेत निकला..नागराज शीशे से चिपक गया..प्रेत उसकी ऊपर उछला..पैर नागराज गायब हो गया..और इसी के साथ सभी नागु-सापों ने शीशे पलट दिए..और निचे बिछा दिए..अब प्रेत फंस गया था..कुछ देर इधर उधर टकराने के बाद वो फट गया...और इसी के साथ पूरी हो गयी ध्रुव-नागराज की पहली मंजिल..क्यूंकि प्रेत के साथ खतम होते ही..वो घर भी खतम हो गया.

“नागराज हमने इस घर को तो इसके अंत के पास भेज दिया..अब ये दूसरा घर और फिर तीसरा घर..”

“सही कहा..पर लोरी ने कहा था ५ घर हैं?”

“वो तो कहा था पर वो सब बाद में सोचेंगे..अभी तो जो सामने है वही चलो!”

दोनों घर के सामने पहुंच गए और साइड होकर दरवाज़ा खटखटाया...दरवाज़ा नहीं खुला उन्होंने २-३ बार दुबारा दस्तक दी पर कुछ नहीं हुआ...नागराज ने फिर जोर से लात मारी दरवाज़े पर और दरवाज़ा अपने आप खुल गया...दरवाज़ा पहले से ही खुला हुआ था..

दोनों अंदर गए..सब जगह अँधेरा ही अँधेरा था..कुछ कदम दूर चलते ही..अचानक रौशनी हो गयी ये रौशनी सूरज की थी..सीन बदल चूका था...चारों तरफ बंजर जमीं, रेत ही थी बस!

हमारी दुनिया में:

भारती न्यूज़ चैनल:ताज़ा खबरों से पता चला है की शहर में जो काली किताब का आतक छाया हुआ था वो अब लघभग खत्म सा हो गया क्यूंकि उन ८ लोगों के मरने के बाद कोई और खबर सामने नहीं आई है.”

भारती सोच रही थी “ये सब नागराज और ध्रुव के कारन हुआ है..पर वो सब अभी हैं कहाँ? कुछ बताया भी नहीं..जरूर किताब के रहस्य में ही उलझे होंगे..”

वो उलझे नहीं थे..उलझ गए ही थे...और वो भी किताब की दुनिया में ही..

ध्रुव के घर पर श्वेता और लोरी...वो किताब को देख रहे थे..अचानक किताब हवा में उठी खुली..और उसके आगे के पाने फट गए..और हवा में ही जल गये...

“ये क्या हुआ?”श्वेता ने पूछा..

“श...शायद दोनों ने अपनी पहली मंजिल पूरी कर ली..”लोरी के माथे पर चिंता थी.

“ये तो अच्छा हुआ न!”

“ह..हैं? हाँ,..”

किताब की दुनिया:

“अब ये कैसी जगह पहुँच गए हम..? और फिर वही वापिस जाने का कोई रास्ता नहीं है..” नागराज बोला.

“वो तो होना ही है नागराज, लेकिन ऊपर से ये गर्मी...उफ़, पसीना है की रुक नहीं रहा है...प्यास बढे जा रही है, तुम्हे नहीं लग रही क्या?”

“नहीं तो, मेरे को तो कुछ गर्म नहीं लग रहा जरूर ऐसा शीत नाग के कारन हो रहा होगा.” लेकिन तभी शीतनाग बाहर आया..और उसने नागराज को बताया की उसने तो कुछ नहीं करा. तभी ध्रुव की नज़र नागराज की बेल्ट पर जाती है.

“नागराज तुम्हारा ओम कहाँ गया?”

“ओम? ओह्ह वो ..वो जब मैं तुम्हे बचने आया था तो उस समय उन आत्माओं को खतम करने के लए फैंका था जो उन्ही के साथ नष्ट हो गया था.

ध्रुव को न जाने क्या हुआ की उसने भी अपना ओम उतरा और वहां बने एक छोटे से पौधे पर रख दिया. उसी समय पौधा सुख गया..

“अरे ये क्या हुआ इस पौधे को? हम्म..जरूर ओम की सत्य शक्ति ने इस पाप की दुनिया के पौधे को भी खतम कर दिया.”

“नहीं नागराज , गलत कह रहे हो तुम...ये ओम असली ओम नहीं है..जरूर यहाँ की शक्तियों के संपर्क में आने से इसका प्रभाव बदल गया है..देखो इसको उतारते ही मेरा पसीना भी रुक गया है और अब ज्यादा गर्मी भी नहीं लग रही है. हाँ प्यास जरूर लग रही है...ये ओम यहाँ की शक्तियों को बढा कर हम पर पहुंचा रहा है.”

“लगता है तुम सही कह रहे हो ध्रुव, इसके ऐसा हो जाने के कारन ही वो हम को पकड़ पाए...पर अब यहाँ से कहाँ जाएँ?”

“सीधे ही चलते ही...कहीं कोई खास चीज़ तो नहीं दिख रही जिसके पीछे हम जायें..”

दोनों सीधे ही चल दिए. इतने समय से न सो पाना, न खाना न पीना , न आराम, ऊपर से ऐसी जगह..दोनों को बुरी तरह से थका दिया था..

अचानक ध्रुव को चक्कर आने लगे...शायद उसे पानी की कमी होने लगी थी...नागराज के पास तो लाखों सर्पों की शक्ति थी इसलिए उसके साथ अभी ऐसा नहीं हुआ था.

“आह..पानी ...नागराज पानी..”

“उफ़..ये क्या हो रहा है अब इस रेगिस्तान में से पानी कहाँ से निकालू? अरे हाँ ...शीत्नाग बाहर आओ..” नागराज ने तुरंत उसे ध्रुव के मुह में ठंडी बर्फ के कुछ छोटे टुकड़े डालने को कहा...अभी ध्रुव के मुह में एक ही टुकड़ा गया था की जोरो से हवा चलने लगी..और चूँकि हवा गरम थी..बर्फ के टुकड़े हवा में ही पिघल गए और सुख गए! अब ये क्या नयी मुसीबत है?

ध्रुव को अब सही लग रहा था..दोनों आगे बढ़ दिए..कुछ दूर ही उन्हें कोई चीज़ दिखी..उन्होंने अपने कदम तेज कर दिए..पास आकर देखा तो एक पानी का कुआँ था...अंधा क्या चाहे २ आखें? पर आँखें ऐसी होनी चहिये जो लगाने पर ज्योति दे....सिर्फ आंख लगाने से अंधा देखने नहीं लग जाता.

पानी का कुआँ जरूर है पर ये नहीं भूलना चहिये की ये दुनिया उनकी नहीं है. यहाँ कुछ भी हो सकता है.

“अब क्या करें? इस पानी को पिए या नहीं?”

“नहीं पी सकते!”

फिर से वही गरम हवा चलने लगी...और इस बार तो और भी गरम थी..अगर ये हवा कुछ और देर तक इनको लगती रही को इनका शरीर सुख जायेगा एक सूखे पेड़ की तरह.

दोनों को उस समय एक ही रास्ता दिखाई दिया कुँए के अंदर का..सो दोनों ने छलांग लगा दी..छपाक की जोर से आवाज़ हुई और दोनों उस पानी में खो गए.

इधर लोरी और श्वेता:

“नहीं ये क्या हो गया, क्या करा उन्होंने?”लोरी चिल्लाई

“क्या हुआ लोरी?”

“श्वेता गडबड है , मेरा उन से अब संपर्क नहीं हो पा रहा है...उन्होंने अपने ओम खो दिए हैं..नहीं उफ़...अच्छा नहीं करा उन्होंने!”

श्वेता को लोरी की बातें समझ नहीं आ रही थी उसे तो बस अपने भाई और नागराज की फ़िक्र हो रही थी.

कुँए के अंदर वापिस:

नागराज और ध्रुव पानी के अंदर तैर रहे थे..अभी तक तो उन्हें कुछ अलग दिखा नहीं...न उन्हें कुछ ‘अलग हुआ’..थोड़ी देर तैरते तैरते उन्हें एक सुरंग दिखाई दी जिसमे से लाल रौशनी फुट रही थी.दोनों ने एक दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में उस तरफ चलने का इशारा किया. दोनों उस ओर चल दिए. पर अंदर कुछ और ही नज़ारा था. अंदर पानी ही नहीं जा पा रहा था और अंदर लाल रौशनी जल रही थी कैसे? समझ नहीं आ रहा था. दोनों अंदर घुस गए और चलने लगे.अभी कुछ दूर ही चले होंगे की जमीन हिलने लगी...और उसमे दरार आने लगी...अब पता नहीं उन्होंने यहाँ आकर गलती करी या अब कोई गलती करने वाले थे...कुछ हो नहीं रहा था..जबसे दुसरे घर में घुसें है तब से बस भागे जा रहा हैं..कोई चीज़ भी तो नहीं है जो उनके पीछे पड़ी हुई है...अचानक दीवारें टूटना शुरू हुई और जमीन भी टूटने लगी...

“नागराज, भागना पड़ेगा!” दोनों तेज़ी से दौड़ने लगे...कुछ देर तक तो वो भागते रहे पर आगे..रास्ता ही खतम हो गया था..वो दोनों एक दुसरे के सहारे एक पत्थर पर टिके हुए थे..आगे कुछ था ही नहीं..न तो कोई खाई थी न ऊपर कोई छत थी..अजीब स्तिथि हो गयी..

“अब क्या करें ध्रुव? यहाँ से कहाँ?”

“पीछे से तो जा नहीं सकते नागराज आगे ही चलेंगे ..कूदो......”

दोनों एक साथ निचे कूद गए...

“आह...कमर टूट गयी मेरी...”

“उफ़ मेरे पाँव में कुछ नुकीला घुसा है” नागराज बोला.”रुको जगमग सर्प बाहर आओ...”

नागराज के साथ अब उसके सर्प भी शक्तियां इस्तेमाल करना सीख गए हैं. जगमग सर्प अब सूरज की या किसी भी तरह के रौशनी के स्त्रोत से रौशनी अपने अंदर जमा कर सकते हैं ताकि अँधेरे में रेडिएशन की तरह चमक सके.

अंदर जब रौशनी हुई तो हालत देखने लायक थी. नागराज के पाँव में किसी कंकाल की नुकीली हड्डी घुस गयी थी. चारों तरफ कंकाल पड़े हुए थे. जिनपर खून सना हुआ था..मांस के कुछ पतले धागे से चिपके हुए थे बस.

“अब कहाँ जायें नागराज चारों तरफ तो बंद है..ऊपर से हम गिरे हैं?”

नागराज भी कुछ कह नहीं पाया. दोनों वहीँ कंकालों को हटाकर बैठ गए. अब वहां कुछ कर भी नहीं सकते ,पड़े पड़े नींद आ गयी उन्हें.

सुन्न्न्न्न......सुन्न्न्न....कोई आवज़ सी आने लगी जैसे कोई सीटी बजा रहा हो..ध्रुव की आंख खुल गयी..और वो इधर उधर दखने लगा की आखिर आवाज़ आ कहाँ से रही है..? इस समय तो नागराज के जगमग सर्प भी नहीं थे जो रौशनी कर सके..वो आवाज़ की तरफ बढ़ गया..अँधेरे में कुछ झपटा उस पर..

“आह्ह...”ध्रुव ने जोर से चीख मारी...तुरंत नागराज ने रौशनी करी और ध्रुव की हालत देख कर वो दंग रह गया...जगह जगह से उसका मांस कटा हुआ था..उसके हाथ में स्टार ब्लेड थी..

“ये..ये क्या हुआ ध्रुव? ..

“पता नहीं नागराज, यहाँ कुछ है जिसने मुझे अपने अंदर खीच रहा था..और नोचने की कोशिश कर रहा था..आह..मेरा हाथ ..मेरा हाथ अकड रहा है..इसमें कुछ हो रहा है..”

“हाथ दिखाओ ध्रुव...” नागराज ने तुरंत अपने कुछ सूक्ष्म सर्प उसके शरीर में भेजे..

‘नागराज ध्रुव के शरीर में कुछ आदमखोर कीटाणु घुस गए हैं..और ये अंदर से इसका मांस खा जायेंगे..हम इन्हें अभी खतम कर देते हैं.’

ध्रुव हाथ पकड़ कर बैठ गया.

नागराज गुस्से में था...

“बस बहुत हो गया ये चूहे बिल्ली का खेल...अभी खतम कर दूँगा सब!..नागराज तुरंत आवाज़ की दिशा में घूम गया ...वहां देखा तो एक आदम खोर बेल की तने थी...

“अच्छा तुम हो वो...मुझे लगा फिर से कोई आत्मा का चक्कर है..”नागराज तुरंत अपने ध्वंसक सर्पों को बाहर निकाला और बेल पर निशाना लगाकर छोड़ दिए...विस्फोट हुआ पर बेल का कुछ भी नहीं बिगड़ा. नागराज ने अपने कई सर्प इस्तेमाल करे पर कोई फायदा नहीं हो रहा था.

“हम्म...तुम यहाँ की पाप की दुनिया के हो तुम्हे तो सिर्फ नागफनी सर्प ही खतम कर सकते हैं. नागफनी सर्प बहार आओ.”

नागफनी सर्प ने अपना काम करना चालू कर दिया..और सटासट बेल को काटने लगे..अचानक पीछे से आवाज़ आई..

“आर्घ्ह्ह ...कौन है? जिसने मुझे चोट पहुंचाई...कौन है?”

बेलें अपने आप हटने लगी तो पीछे दिखा एक चेहरा जो की शक्ल से किसी पेड़ के तने जैसा था...कौन है तू..जिसने मुझे चोट पहुँचाने की हिम्मत करी...

“नागराज हू मैं..और ये ध्रुव है...चुप चाप हमारे रस्ते से हट जाओ..वरना अच्छा नहीं होगा!”

“मुझे धमकी देता है ये ले..”बेल ने नागराज के शरीर में अपनी कुछ बेले डाली..पर उल्टा उसे ही अपनी बेले वापिस निकालनी पड़ गयी...वो जानता नहीं था की नागराज के शरीर में सर्प हैं..लेकिन नागराज ने ये मौका नहीं छोड़ा और उसने अपने नागफनी सर्प को उसकी तरफ भेज दिया...नागफनी सर्पों ने उसे खत्म कर डाला...पर मरते मरते उसने कंकालों की तरफ कुछ फैंका कुछ फूल जैसा...जिससे सभी हड्डियां..में जान सी आ गयी और उन्होंने नागराज को जकड लिया..इस फंदे को न तो नागराज तोड़ पा रहा था और न ही नागफनी सर्प..

अब ध्रुव की बारी थी..ध्रुव ने अपनी यूटिलिटी बेल्ट से पैंट स्प्रे की छोटी केन निकली और हड्डियों के जोड़ पर डाल दिया...दुनिया जो भी हो..प्रकृति का नियम नहीं बदल सकती...सभी हड्डियों के जोड़ ढीले हो गए और एक एक करके सब गिर गयी..नागराज और ध्रुव के लिए अब बेल के खतम होने से रास्ता खुल गया था और वो वापिस पुरानी किताब की काली दुनिया में पहुँच गए थे...दूसरा घर भी खतम हो गया था.

इंसान की दुनिया में:

फिर वही हुआ किताब हवा में उठी आधे पन्ने फत्ते और हवा में जल कर खतम हो गए..काली किताब का एक और अध्याय खतम हो गया था और इसी के साथ श्वेता के चहेरे पर चमक आ गयी थी पैर लोरी की चिंता और बढ़ गयी थी..’जैसा होना चाहिए था वैसा हो नहीं रहा ..’

भारती अपने घर में चिंता कर रही थी.

‘नागराज को पता ही नहीं चल रहा है..मैं कल ध्रुव के घर जाउंगी वही पता करुँगी..’


तीसरा घर:

नागराज और ध्रुव ने कुछ देर घर के बाहर बैठ कर बिताया. अपने आप को थोडा आराम देना चाहते थे.

“हुफ्फ़! अजीब दुनिया है ये नागराज, ये आत्माएं ऐसे रह कैसे पाती हैं?”

“सही कहा ध्रुव, अगर यहाँ पर मैं या तुम अकेले आये होते तो कबके खत्म हो जाते या इस दुनिया का हिस्सा बन जाते. पर अब हमें बाकी तीन घर भी खतम करने होंगे. और यहाँ पैर बंदी आत्मोन को मुक्ति दिलानी पड़ेगी चलो!”

दोनों उठे और चल दिए. एक बार फिर वोही दृश्य आ गया है एक घर, एक दरवाज़ा, न जाने क्या है उसके पीछे ?

दोनों ने जैसे ही दरवाज़े को खटखटाया, दरवाज़ा तुरंत खुल गया..अंदर एक गुफा सी बनी हुई थी..हर जगह रौशनी थी और ठीक सामने एक बड़ा सा पत्थर का टीला था. जिस पर बैठा था एक आदमी, नहीं एक प्रेत, नहीं एक राक्षस..पता नहीं..अछे खासे राजा के कपड़ों में सजा हुआ था वो. उसके होंठ हिले और मुह से आवाज़ आई..

“आओ नागराज और ध्रुव, तुम्हारा ही इन्तेज़ार कर रहा था मैं. बाहर बैठे क्या कर रहे थे तुम लोग?”, तुम सोच रहे होगे मैं कौन..मैं महान प्रेत गजी का एक गुलाम हू...और मुझे यहाँ पर आने वाले लोगों को गुलाम बनाने का हुक्म मिला हुआ है.”

“पर तुम ऐसा क्यों करते हो?”ध्रुव ने पूछा

“हा हा ..बच्चों ये मत सोचो की तुमसे बात कर रहा हू तो मैं..तुम्हारे साथ हो गया हू या मुझे तुमसे हमदर्दी ऐसा कुछ है..समझे! और अब सीधा सी भाषा में सुन लो इस घर को खतम करने के लिए तुम्हें मुझे खतम करना होगा..मैं कैसे खतम होंगा मुझे नहीं मालूम, सिर्फ मेरे आका गजी को ही मालूम है. हा हा, और वो तुम्हें बताने से रहे!”

“इतनी मुश्किलों से यहाँ पहुंचे हैं तो तुम्हे भी तुम्हारे अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लेंगे..”नागराज ने गुस्से में मुठी भींच ली.

“अरेरे...हाहा ध्रुव जरा रोको इसे तो जरा...”उसने एक फूंक मारी नागराज पर. और नागराज वहीँ रुक गया, पीछे मुड़ा..

“ध्रुव जाओ यहाँ से!”

“क्या कह रहे हो नागराज? क्या हुआ तुम्हें?”

“जाओ ध्रुव , जाओ..मेरा काला रूप मुझ पर हावी हो रही है ध्रुव जाओ..”

“नहीं नागराज मैं इसे खतम करे बिना और तुम्हे छोडकर नहीं जा सकता”

“जाओ.......हम्म...नहीं जाना चाहते मत जाओ...अब मैं तुम्हें जाने भी नहीं दूँगा गुर्र..बहुत नुक्सान किया है तुमने मेरे आका की दुनिया का!”

नागराज का रूप बदल चूका था वो फिर से खलनायक नागराज बन चूका था...ध्रुव के लिए वैसे ही नोर्मल नागराज कम भारी है जो ये खलनायक रूप में आ गया...उसने तुरंत ध्रुव को गले से पकड़ कर उठा लिया...

“छोडो नागराज! मैं ध्रुव हू ...”

“जानता हू मैं, और मैं नागराज का बुरा रूप हू सब पता है मुझे..बहुत पहले मिस किलर ने मुझे निकाला था इसके शिन्कंजे पर तब मैं वापिस इसके अंदर समां गया था पर अब नहीं यहाँ मैं हावी होऊंगा ...”उसने ध्रुव को थोडा और ऊपर उठाया और दूर दिवार पर दे मारा..

नागराज को कैसे बचाओं?..हाँ ..नहीं...शीत्नाग , सौडंगीको बुलाने का भी कोई फायदा नहीं उनके भी बुरे रूप ही निकलेंगे! यहाँ पड़ी चीज़ें ..वो पानी ..पानी को नागराज पर फैंक कर देखता हू.

ध्रुव तुरंत कूद कर, पानी के बर्तन के पास गया और उसमे से पानी निकाल कर नागराज पर दे मारा...पर उल्टा ही असर हुआ..नागराज और भड़क गया. और ध्रुव को मारने के लिए दौड़ा.

“हे भगवान, ..कैसे रोकू नागराज को...इसी सारी भावनाएं भी तो मर चुकी...भावनाएं..येस आत्माएं मशीन तो होती नहीं भावनाएं तो इनमे भी होती हैं तभी तो ये बुरा-अच्छा करती हैं..मिल गया आईडिया ...रुको नागराज! मारना चाहते हो तो मुझे मार दो..पर एक बात बताओ ..मुझे मारने से तुम्हे क्या मिलेगा?”

“हा..हा..अच्छा सवाल है..तुम्हें मारकर मैं आका को खुश कर दूँगा..और बन जाऊंगा इस दुनिया का मालिक.”

“हम्म..बहुत गलत सोचते हो तुम नागराज ...मुझे मार कर तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा क्यूंकि वो ऊपर बैठा है न वो इसी इन्तेज़ार मैं है की कब तुम मुझे खतम करो...और सारा श्रय वो ले जाये..”

“तुम्हें क्या पता?”

“तुमने सुना नहीं वो अपने आका का सबसे भरोसेमंद गुलाम है..और वो क्यों चाहेगा की कोई और यानि तुम उसकी जगह लो?, मेरे मरने के बाद वो तुम्हें भी मार देगा और इस दुनिया का एक छत्र राजा बन जाएगा.”

“ये बात है...ऐसा नहीं होगा..तुम्हें तो मैं बाद में देखूंगा ..पहले इसे ही निपटा देता हू..”

नागराज को अपनी तरफ आते देख..प्रेत चौंक गया!

“अरे तुम मेरी तरफ क्यों आ रहे हो..ध्रुव को मारो..”

“वो तो मरेगा ही..पर पहले तुम मारोगे मेरे रस्ते के कांटे..”और इसी के साथ दोनों में भयंकर लड़ाई शुरू हो गयी..पर सब जानते ही है जीत नागराज की ही होनी है ...उसके पास दो शक्तियां है..वहीँ प्रेत के पास सिर्फ एक. जीत नागराज की हुई.

“देखा तुने ध्रुव, मैंने इसे खतम कर दिया..अब मैं यहाँ का राजा बनूँगा..”

“सो तो है..पर तुम ऐसी दुनिया के राजा क्यों बनना चाहते हो जहाँ कोई नहीं है?”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये हा नागराज की, यहाँ पर सिर्फ खाली आत्माएं हैं...कंकाल है..उनसे गुलामी कराकर तुम्हे क्या मिलेगा?, मुझे तो इसमें कोई मज़ा नज़र नहीं आता!” ध्रुव नागराज को वापिस लाने की कोशिश कर रहा था “नागराज याद करो तुम एक सुपर हीरो हो..जो इंसानों की मदद करता है..एक भगवान है उनके लिए...पूजते हैं लोग तुम्हें वहाँ..यहाँ गुलाम तुम्हारा कहा मानेंगे तुम्हें पूजेंगे नहीं,”ध्रुव बोलता जा रहा था.

“चलो नागराज, अपनी दुनिया में चलो तुमने पूरी इंसानियत, पुरे ब्राह्मांड, और अपने देव कालजयी से वादा किया है की तुम कभी मार्ग से नहीं हटोगे!वहां तुम्हारा प्यार विसर्पी भी तुम्हारे साथ रहेगी!”

“याह्ह....ये क्या किया तुने ध्रुव...उफ़ अच्छे वाला नागराज मुझ पैर फिर हावी हो रहा है..आह..”और एक आह के साथ नागराज फिर से ‘नागराज’ में तब्दील हो गया था.

“थेंक यु ध्रुव”

“मानना पड़ेगा लड़के तेरा दिमाग काफी तेज है...”

दोनों ने पलट कर देखा ...वो प्रेत फिर से आ गया था!

“अरे तुम मरे नहीं?”

“हा हा हा मैंने कहा था न मेरे मरने का राज़ तो मैं भी खुद नहीं जानता , तुम कैसे जान जाओगे?”

कहकर उसने दोनों को हवा में उदा दिया और उन पर तेज धार चीजों से वार करने लगा..जहा से चले थे फिर वही पहुँच गए...

“आह...ध्रुव अब कैसे रोके इसे?”

“इधर उधर देखो नागराज शायद कुछ मिल सके.....वो देखो उस टीले पर जहाँ ये बैठा हुआ था वहां निचे कुछ गुदा हुआ है...क्या है वो...”

नागराज ने अपनी सर्प नज़रों से ध्यान से देखा उसे.

“पता नहीं ध्रुव लगता है कोई मिस्त्र की भाषा है..कुछ समझ नहीं आ रहा ...”

“अब यहाँ पर मिस्त्र निवासी को कहाँ ढूंढे?”

“मेरे अंदर ध्रुव..सौडंगी ...बाहर आओ...”वो बाहर आई...”जाओ और बताओ की वहां पर क्या लिखा है जल्दी..”

सौडंगी ने पढ़ा..’नागराज यहाँ कुछ अजीब लिखा हुआ है...एक सांप, एक तारा, और हवा...बस!’

नागराज ने ध्रुव को बताया...

”नागराज सांप यानि तुम, तारा मतलब मैं , हवा मतलब ये प्रेत...पर मारें कैसे ?”

तब सौडंगी बोली..

“नागराज तुम अपनी आत्मिक शक्ति को ध्रुव की आत्मिक शक्ति से मिलाओ और ध्रुव तुम इसकी मदद करो...इसकी शक्ति को अपनी शक्ति से मिलने दो...”

नागराज हवा में ही लटके हुए ध्यान में चला गया...कुछ मिनट में ही उसका पूरा शरीर हरी रौशनी से चमक रहा था!..वो आत्मा के रूप में आ चूका था...वो ध्रुव के अंदर समां गया...नागराज का शरीर हवा में ही था...प्रेत को कुछ समझ ही नहीं आया की ये क्या हो रहा है?

ध्रुव ने तुरंत उसका फंदा तोडा और जमीन पर आ गया...और साथ ही नागराज का शरीर सौडंगी को दे दिया . उसने आगे जाते ही प्रेत को पकड़ लिया...उसके पकड़ते ही प्रेत में से धुआं निकलना शुरू हुआ और फिर वो जलने लगा और कुछ देर मैं ही जल कर गायब हो गया..इसी के साथ वो घर भी खतम हो गया ..नागराज वापिस अपने शरीर में आ गया था...

पर ये क्या ? वो किताब की दुनिया में थे...ये मिस्त्र में कहाँ से आ गए? उनके चारों तरफ मिस्त्र के पिरामिड ही थे..और वो खुद एक पिरामिड में थे..जो अब टूट रहा था...और वो इतनी ऊंचाई पर थे की अगर कूदे तो हड्डियां तो चूर होने ही वो भी ऊपर पहुँच जायेंगे!

“शीतनाग....बाहर आओ...जल्दी...”

“बोलो नागराज...”

“तुरंत यहाँ एक मोटी बर्फ की यहाँ से निचे तक एक परत बनाओ जिस पैर हम फिसल कर निचे जा सके..”

शीतनाग ने सेकंडों में परत बना दी..ध्रुव और नागराज बच गये थे.

“ध्रुव, ३ घर भी खतम! अब ४ कहाँ है?”

“तुमने चौथा भी खतम कर दिया....”

दोनों ने पलट कर देखा!

“तुम....यहाँ?”

ध्रुव के घर:

एक बार फिर किताब उठी, और इस बार पन्ने नहीं फटे, पूरी किताब ही जल गयी...

“नहीं.........नहीं...............ऐसा नहीं हो सकता! ये दोनों ने क्या किया?”

“अरे लोरी तुम परेशां क्यों हो रही हो? ये तो अच्छा है न दोनों ने तीसरा घर भी खत्म कर दिया!”

“तेरे लिए अच्छा होगा लड़की मेरे लिए नहीं!....वो अभी वापिस नहीं आ सकते...”

लोरी ने कुछ जमीन पर बनाया और मंत्र बोलने लगी...पर श्वेता को कुछ गडबड लगी उसने पैर से वो जमीन पैर बना यंत्र मिटा दिया...

लोरी गुस्से से पागल हो गयी...”गुर्र...लड़की अब तू नहीं बचेगी!” वो उठी और श्वेता को जोर से तमाचा मार..की उसके मुह से खून निकलने लगा...

श्वेता फिर आगे बढ़ी पर लोरी ने उसे और दूर फैंक दिया!

“आह..ये तुम क्या कर रही हो लोरी...होश में आओ...”

“मैं लोरी नहीं...

“गजी है...हैं ना!”

लोरी ने पलट कर देखा..ध्रुव तुम?!

“सिर्फ मैं ही नहीं, नागराज और लोरी भी हैं मेरे साथ..”

“तुम ..तुम बच कैसे गए? तुम्हें तो पिरामिड में ही दफन हो जाना चहिये था...”

“हो जाते अगर शीतनाग ने हमारी मदद न करी होती..और बाद में हमें लोरी न मिल जाती.”

“लोरी ने ही हमें बताया की तुम कौन हो? और हमारे जाने के बाद तुमने लोरी को बंदी बना लिया था..और हमें काली शक्तियों वाला ओम इसके ओम से बदल दिया था.........”

“तुमने भले ही मुझे बंदी बना लिया था...पर मैं आजाद हो गयी और फिर ध्रुव की मानस तरंगों का पीछा करती हुई मिस्त्र इनके पास पहुँच गयी और इन्हें यहाँ ले आई..”

“हम्म...बहुत बड़ी गलती करी मैंने तुम्हारे शरीर को तुम्हारे साथ भेजकर और उससे भी बड़ी गलती करी..तुम दोनों को एक साथ भेज कर!...”

“लेकिन एक बात मेरी समझ नहीं आई...तुम अपनी काली किताब की दुनिया से बाहर कैसे आये?”

“हा हा ..ये काम मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं..मैं किसी ऐसे आदमी के शरीर पर कब्ज़ा करके आ सकता था जो मन से मजबूत हो...ऐसे मुझे तीन आदमी मिले पर उनमे से दो का तो शरीर ही जला दिया था लोगों ने इसलिए मुझे फिर वापिस आना पद पर एक लड़का आया जिसकी आत्मा पर कब्ज़ा कर लिया मैंने और यहाँ आ गया..

“कहीं तुम हिमांशु की बात तो नहीं कर रहे....कहाँ है वो अब?”नागराज ने गुस्से में पूछा

“हा हा हाँ वही था हमारी लड़ाई भी तो हुई थी...हिमांशु तो कब का मेरी दुनिया में ही मर चूका था..मैं तो उसके शरीर में आकर यहाँ अपना राज़ चलाना चाहता था..वो सब जो मैंने तेरे साथ करा नाटक था मेरा और मेरी शक्तियों का..पर बाद में मुझे उसका शरीर छोडना पड़ गया तुम लोगों के ही कारन कहीं तुम्हें शक न हो जाए. मैं मिस्त्र में कई हजारों साल पहले फराहो के लिए काम करता था..पर मेरी संदिग्ध गतिविधियों को देखकर जैसे आत्माओं को बुलाना, उसने मुझे मरवा दिया...लेकिन मैंने पहले ही इसका इंतज़ाम कर रखा था..अपनी काली दुनिया का...बस अब बातें बहुत हुई...अब मरो...”

एक तरफ गजी था और दूसरी तरफ नागराज, ध्रुव और लोरी एक साथ हाथ पकडे..

दोनों तरफ से शक्तियों की किरने फूटने लगीं...उधर गजी उन पर भारी पड़ता जा रहा था...सब लड़ते लड़ते बहार बगीचे में आ गए..उधर कोई कुछ जमीन पर कर रहा था पर किसी ने देखा नहीं..

गजी ने एक वर श्वेता पर कर दिया जिससे तीनो का ध्यान बंट गया और हाथ खुल गए..और इसी समय गजी ने उनको बंधक बना लिया.

“आह! ये उर्जा वार किसने किया..पीछे मुड़कर देखा...तो भारती खड़ी थी...”

उसे देखते ही वो भागने लगी..गजी भी पागलों की तरह उसके पीछे भगा. भारती रुक गयी... वो भी एक कदम और चला और रुक गया...

“यार्ग्ग्ग्घ्ह्ह्ह्ह ......आह मैं कहाँ फंस गया?”

“हा हा गजी महाराज ये वो तिलिस्म है जिसमे में बिन बुलाए प्रेतों को बांध कर रखा जाता है..”

उधर नागु ने अपनी मणि से उनको आज़ाद करा दिया...

लोरी ने फिर अपने एक चमकीले पत्थर में गजी को कैद करा और उसे जला दिया.

“अरे भारती तुम यहाँ कैसे आई?”

“नागराज मैंने सोचा था की तुम्हारा पता नहीं चल पा रहा है..इसलिए ध्रुव के घर पता करुँगी..”,” मैं जब आई तो तुम्हारी और इस प्रेत की बातें सुनी...मैंने तुरंत यहाँ मिटटी में वो तिलिस्म बनाया ....और इसे फंसा दिया...मुझे नागु ने देख लिया था..इसलिए वो भी बाहर आ गया!”

“अच्छा हुआ! लोरी पर पांचवा घर कौनसा था?”

“ये खुद, ध्रुव .....”

नागराज और ध्रुव ने एक दूसरे को देखा और सब हँसने लगे..

“भाई बहुत घूम लिए....अब सोना है ..चलते हैं...”दोनों एक साथ बोले और ध्रुव अपने घर में और नागराज भारती के साथ महानगर की ओर चल दिया. और लोरी अपने घर!

अगर इंसान चाहे तो आत्माओ से जीत सकता है ..चहिये सिर्फ हिम्मत, इच्छाशक्ति...और आशीर्वाद!

समाप्त.